Friday, 29 March 2013
Friday, 25 January 2013
स्म्रतियाँ
अपार जतन कर
भी
उसे ना पाया
मैनें
जब कोई झांकता
है उस ओर ;
जो कभी मेरा
भी हो सकता था । ।
अब तुम बन गये
हो निशा के स्वप्न दिवस
और मिल गया
निराशा में जीवन का मधुर रस …
रह गये अब
एकाकी क्षण
जिसमें कभी
फ़ूटे थे ‘अंकुर’
लेकर कोमल
मधुर स्वर
जलने लगी है
अब तो आशाएँ भी…
इंतज़ार करती
प्यासी आंखो को;
अब… ना कोई आस
ना कोई उम्मीद
फ़िर भी खुश हूँ
;
यह जानकर
कि कोई
ज्यादा खुश है
मुझसे…। ।
मन
रूठे मन मान
जा तू
वो ना मिलेगा,
ये जान जा तू ।
वह भुला चुका
है अपने ज़हन से तुझे ;
नज़र घुमा लेगा
गर
मिल गया त ।
तब क्यूं हसाँ
था जब वो मिला था ;
अब जो बसाया
है अंधकार सा छाया है
ना भूलना कभी
क्योकिं…
एहसास है
तुझमें
उसका ।
जानता हूं
मौन में भी
उठ रहे है
मधुर आह्वान
उसके…
पर
उम्मीद छोड़ दे
अब बिल्कुल ;
वो ना कभी
तेरा था
ना होगा
यह जान ले तू
।
मैं…
मैं;
चाचा-पापा, माँ- बाबा सबकी लाडली
मैं ;
थी जब आठ- नौ महीने की…
ले जाते बिठाके कंड़िया में
घुमाने…नन्ही पल्कों से
देखती…
शायद यही सोचती…
क्या यही है मेरा जन्म स्थान ?
कभी-कभी ले आते
चाचा पापा, माँ-बाबा
फ़्राकों का अपार भंडार ॥
जब जाते बाबा
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कह
फ़्राक हाथ में दबाएं भागी
मैं ;
अब हो गई हूँ 23 पार
फ़िर भी सबकी कितनी दुलारी… मैं;
आज जब सुनती हूँ
किस्से बचपन के
सोचती हूँ
क्यूँ हो गई…
सियानी मैं…?
Saturday, 12 January 2013
तलाश
तलाश जिसकी थी उसको
तो न पाया मैनें
इसी कोशिश में नया
रास्ता बनाया मैनें ।
मंजिल का न पता न राह
बर का ठिकाना
चलने लगे तो खुद ब
खुद रास्ता बनाया मैनें।
चले थे अकेले अपने
बनाये मकसद पर
हमदर्द मिलते गये तो
ख्वाब सजाया मैनें ।
तलाश वह है जो कभी
पूरी नही होती
सुना था उससे बेहतर
न पाया मैनें ।
दुन्यवी चीज की तलाश
की कीमत क्या?
तलाश जिसकी थी एहसास
ही पाया मैनें ।
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