अपार जतन कर
भी
उसे ना पाया
मैनें
जब कोई झांकता
है उस ओर ;
जो कभी मेरा
भी हो सकता था । ।
अब तुम बन गये
हो निशा के स्वप्न दिवस
और मिल गया
निराशा में जीवन का मधुर रस …
रह गये अब
एकाकी क्षण
जिसमें कभी
फ़ूटे थे ‘अंकुर’
लेकर कोमल
मधुर स्वर
जलने लगी है
अब तो आशाएँ भी…
इंतज़ार करती
प्यासी आंखो को;
अब… ना कोई आस
ना कोई उम्मीद
फ़िर भी खुश हूँ
;
यह जानकर
कि कोई
ज्यादा खुश है
मुझसे…। ।

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