मैं;
चाचा-पापा, माँ- बाबा सबकी लाडली
मैं ;
थी जब आठ- नौ महीने की…
ले जाते बिठाके कंड़िया में
घुमाने…नन्ही पल्कों से
देखती…
शायद यही सोचती…
क्या यही है मेरा जन्म स्थान ?
कभी-कभी ले आते
चाचा पापा, माँ-बाबा
फ़्राकों का अपार भंडार ॥
जब जाते बाबा
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कह
फ़्राक हाथ में दबाएं भागी
मैं ;
अब हो गई हूँ 23 पार
फ़िर भी सबकी कितनी दुलारी… मैं;
आज जब सुनती हूँ
किस्से बचपन के
सोचती हूँ
क्यूँ हो गई…
सियानी मैं…?
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